Friday, July 24, 2020

आया राम गया राम : भारतीय राजनीती के रोचक किस्से

आया राम गया राम : भारतीय राजनीती के रोचक किस्से 
भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। और एक लोकतान्त्रिक देश में राजनीति का ऊंट कब कौन सी करवट लेगा ये कोई नहीं जानता। यहाँ तक की जनता जिस नेता और जिस पार्टी को चुनकर भेजते है वो कब किसकी सरकार गिरा दे और किसकी सरकार बनवा दे, ये कहना बहुत मुश्किल है। और इसी सत्ता के खेल में जनता की भावनाओं को रोंधकर स्वार्थ की कुर्सी पर कब्ज़ा किया जाता है। भारतीय राजनीति में नेताओं का दल बदलना बड़ी आम सी बात हो गई है।  इसी कारण नेताओं को दल बदलू भी कहा जाता है। किसी भी पार्टी में कई कई साल तक रहने के बावजूद बहुत से नेता पार्टी बदल लेते है और कारण बताते है पार्टी में उचित सम्मान न मिलना। और ये सब किसी नेता, विधायक या सांसद के लिए कोई नहीं बात नहीं है। भारत में दल बदलने की इस परम्परा को 'आया राम गया राम' के नाम से खूब जाना जाता है। 'आया राम गया राम' वाक्य किस प्रकार प्रचलित हुआ, यह एक बड़ा रोचक किस्सा है। 
बात 1967 की है जब हरियाणा विधान सभा के लिए पहली बार चुनाव हुए थे। उस समय हरियाणा विधान सभा में 81 सीटें थी। 1967 के चुनावों में कुल 16 निर्दलीय विधायक चुनकर आये थे। गया लाल भी उनमें से एक थे। गया लाल हरियाणा के पलवल ज़िले के हसनपुर विधान सभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। चुनाव नतीजे आने के बाद तेजी से बदले घटनाक्रम में गया लाल कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन उसी दिन वो जनता पार्टी में आ गए। लेकिन फिर से गया लाल का मन बदला और 9 घंटे बाद फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए। इस प्रकार  गया लाल ने एक ही दिन में 3 बार पार्टी बदली। बाद में पार्टी नेता राव बीरेंदर सिंह गया लाल को लेकर प्रेस वार्ता करने के लिए चंडीगढ़ ले गए और पत्रकारों को बताया कि गया राम अब आया राम है। राव बीरेंदर सिंह के इस ब्यान ने बाद में 'आया राम गया राम' कहावत का रूप ले लिया और देश में जब भी ऐसी दल बदलने की कोई घटना होती है तो 'आया राम गया राम' कहावत का खूब इस्तेमाल होता है। तो गया लाल ही वो विधायक थे जिन्होंने 'आया राम गया राम' वाक्य को अमर कर दिया। हरियाणा में आया राम गया राम की रवायत ऐसी रही कि बाद में 1968 में फिर से विधान सभा चुनाव करवाने पड़े। 
बाद में भी हरियाणा में कई बार ऐसा ही हुआ और सरकारे दल बदलू विधायकों ने बनाई और गिराई। आखिर में दल बदल से राहत पाने के लिए सविंधान संसोधन करके नया कानून बनाना पड़ा। दल बदल तो अब भी होता है लेकिन अब नए कानून से दल बदलना इतना आसान नहीं रह गया है। 

Saturday, July 18, 2020

क्या मार्कसीट ही सफलता का पैमाना है ?

दोस्तों आज कल 10वीं व 12वीं के परीक्षा परिणाम घोषित हो रहे हैं और बहुत से विद्यार्थियों को अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं आने के कारण निराशा और चिंता ने  घेर लिया है। ऐसे में हर रोज ख़बरें आती है कि परीक्षा परिणाम अच्छा नहीं आने के कारण कई विद्यार्थी गलत कदम उठा रहे हैं और अवसाद ग्रस्त हो रहे हैं। उनके परिजन भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। दरअसल ये भावना हमारे पूरे समाज में समा चुकी है कि बिना अच्छे मार्क्स के हम कभी भी कामयाब नहीं हो सकते। हम लोगों ने जीवन की सफलता को स्कूल की पढ़ाई से जोड़ दिया है। और पढ़ाई भी वो जो हमारे देश और हमारी संस्कृति से मेल ही नहीं खाती है।
 यदि हम किसी दूसरे देश में जाकर वहां के नागरिकों से ये कहे कि आप लोग हिंदी मीडियम से अपनी पढ़ाई करें तो क्या वो लोग उसको अच्छी तरह से कर पाएंगें? 
दूसरी बात क्या हमारे देश में बच्चों की पढ़ाई के साथ अभिभावकों की काउसिलिंग भी होनी चाहिए ? क्योंकि बच्चों पर पढ़ाई का सबसे ज्यादा दबाव मां बाप द्वारा ही दिया जाता है । आज तक ज्यादातर अभिभावकों को यही लगता है कि 10वीं व 12वीं में ज्यादा से ज्यादा मार्क्स हैं सफलता की सीढ़ी है। 
तीसरी बात हमारी शिक्षा पद्धति शिक्षित तो कर रही है लेकिन वो रोजगार देने में असमर्थ है। एक अध्ययन के अनुसार भारत के 80% इंजीनियरिंग ग्रेजुएट किसी नौकरी पाने के काबिल नहीं है। इसी तरह से अन्य विषयों का भी कुछ कुछ यही हाल है। 
दरअसल ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को बचपन से ही यही सिखाते हैं कि ज्यादा से ज्यादा मार्क्स ले के आओ। जितने ज्यादा मार्क्स उतनी बड़ी नौकरी। तो बच्चों पर मार्क्स लेने का दबाव बढ़ता रहता है और बहुत से बच्चे इस दबाव से अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। और जब उनके रिजल्ट अपेक्षा के अनुरूप नहीं आते तो वे गलत कदम उठा लेते हैं। 
तारे जमीन पर, थ्री ईडियट्स ऐसी ही और भी कई फिल्में है जिनके द्वारा ये दिखाने की कोशिश की गई कि हमें सफलता के पीछे नहीं भागना है, हमें काबिलियत के पीछे भागना है। यदि हम काबिल होंगे तो सफलता झख मार के भी मिलेगी। कई बार क्या होता है हम अपने बच्चों से वो करवाने की कोशिश करते हैं जिसमें उनका कोई interest नहीं होता है। तो बच्चा उस फील्ड में हमेशा पीछे रह जाता है और वो सोचता उसी की मेहनत में कमी है, अभिभावक भी बच्चे की ही कमी निकलते हैं। एक अकेला बच्चा अपने सपने को पूरा नहीं करता है बल्कि अपने मां बाप के सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करता है। 
हम में से कितने ऐसे मां बाप है जो अपने बच्चे से पूछते हैं कि उसे क्या पसंद है, वह क्या करना चाहता है, क्या बनना चाहता है। बस हम उसे बस्ता देकर कह देते हैं तुझे फलां के बच्चे से ज्यादा मार्क्स लेने है । एक बच्चे पर मां बाप, पड़ोसी, रिश्तेदार, स्कूल, अपनी क्लास के बच्चे का दबाव होता है। अब इतने प्रेसर में कोई नॉर्मल कैसे रह सकता है। भारत की जनसंख्या 135 करोड़ है लेकिन आज भी हम खेलों में विश्व स्तर पर गिनती में बहुत पीछे खड़े नजर आते हैं। हमारे बच्चे 90% से ऊपर अंक लेते हैं लेकिन उनमें से कितने बच्चे ऐसे है जो किसी फील्ड में विश्व स्तर पर कोई सफलता हासिल कर पाया हो। आज 10वीं व 12वीं के रिजल्ट आने पर सोशल मीडिया पर अपने बच्चों के रिजल्ट बताने वालों की बाड़ आई हुई है और ये सब वो लोग है जिनके बच्चों ने 90% से ज्यादा मार्क्स लिए है। 90% से कम मार्क्स लेने वालों ने अपने बच्चों का रिजल्ट सोशल मीडिया पर शेयर नहीं किया। मतलब बाकी बच्चों का रिजल्ट कोई मायने नहीं रखता । लेकिन क्या आप लोगों ने कभी नोट किया कि इनमें से कितने बच्चे किसी खास फील्ड में कामयाब हुए है। या जो बच्चे कामयाब है उनके 10वीं, 12वीं में कितने मार्क्स आए थे। 
इस साल सीबीएसई बोर्ड की 12 वीं परीक्षा में 12 लाख बच्चे शामिल हो रहे है। हर राज्य का अपना स्टेट बोर्ड अलग है। उप्र स्टेट बोर्ड में इस वर्ष 23 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी। इस प्रकार से देखा जाये तो हर वर्ष करोड़ों बच्चे 12 वीं की परीक्षा पास करते है और लाखों 90% से ऊपर मार्क्स लेते है। लेकिन इनमें से कितने बच्चे ऐसे है जो असल जिंदगी में कामयाब हो पाते है। या जिनको अपनी पढ़ाई का पूरा क्रेडिट मिल पाता है। लाखों बच्चे तो ऐसे होते है जिनके अवसर ही नहीं मिलता अपनी क़ाबलियत दिखाने का। उनको मज़बूरी में कही ढेला लगाकर अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी का बंदोबस्त करना होता है। बहुत से बच्चों को आरक्षण का जिन आगे नहीं बढ़ने देता। वो जहां भी जाते है आरक्षण का जिन उनको आगे खड़ा मिलता है। हमारे देश में बच्चों को पढ़ने के अवसर नहीं मिल पाते है, टेक्निकल एजुकेशन की तो छोड़िये आर्ट्स पढ़ने के लिए भी कॉलेज उपलब्ध नहीं हो पा रहे है। खासकर दूर दराज और गावों में रहने वाली लड़कियों के लिए हालात इससे भी बुरे है। 
अच्छे मार्क्स लेना अच्छी बात है लेकिन अपने उन बच्चों को भी मत भूलों जिनके कम मार्क्स आए हैं। अच्छे मार्क्स कभी भी इस बात की गारंटी नहीं होती कि वो कामयाब होगा। जहां तक संभव हो सके बच्चों को वो सिखाए जो उनका पैशन बन सके। इसका एक फायदा ये होगा कि बच्चा उस काम को कम से कम सुविधाओं में भी करेगा। क्योंकि वो उसका पैशन है। इसलिए अपने बच्चों को अच्छी तालीम के साथ साथ अच्छे संस्कार, जीवन जीने का कला और अच्छा हुनर भी सिखाएं जिसमें उनकी रुचि हो फिर आपका हर बच्चा कामयाब होगा। और भारत आत्मनिर्भर भी होगा।
Friends, today the 10th and 12th exam results are being announced and many students are surrounded by disappointment and anxiety due to not getting the results as expected. In such a situation, everyday news comes that many students are taking wrong steps and suffering from depression due to poor results. Their families are also going through the same circumstances. Actually, this feeling has seeped into our whole society that without good marks we can never succeed. We have associated the success of life with school education. And also the study which does not match our country and our culture.
 If we go to another country and tell the citizens of that country that you should do your studies with Hindi medium, will they be able to do it well?
Secondly, should there be counseling of parents along with education of children in our country? Because most of the pressure on children is given by the parents. Till date most of the parents feel that there are more and more marks in 10th and 12th is the ladder to success.
Thirdly, our education system is educating, but it is unable to provide employment. According to a study, 80% of India's engineering graduates are not eligible to get a job. Similarly, other subjects also have the same condition.
In fact, most parents teach their children from childhood that they should bring maximum marks. The more marks, the bigger the job. So the pressure on children to take marks keeps increasing and many children suffer depression due to this pressure. And when their results do not come as expected, they take the wrong step.
On Taare Zameen, Three Idiots are many other films that have tried to show that we do not want to run after success, we have to run after ability. If we are able, then we will get success too What happens many times, we try to get our children to do that in which they have no interest. So the child is always left behind in that field and he thinks that he is lacking in hard work, parents are also lacking in the child. A single child does not fulfill his dream but works hard to fulfill the dream of his parents.
How many of us have such parents who ask their child what he likes, what he wants to do, what he wants to be. We just give him a bag and tell you to take more marks than a child of such and such. A child is under pressure from parents, neighbors, relatives, schools, children of his class. Now how can anyone be normal in such a pressure? The population of India is 135 crores but even today, we are standing far behind in the world level in sports. Our children score above 90%, but how many of them have achieved success in any field globally. Today, on the 10th and 12th results, there is a fence on social media to tell the results of their children and these are all those people whose children have scored more than 90% marks. Those taking less than 90% of the marks did not share the results of their children on social media. Meaning the result of the rest of the children does not matter. But have you ever noted how many of these children have succeeded in a particular field. Or how many marks came in the 10th, 12th of the child who is successful.
This year, 12 lakh children are appearing in the CBSE Board 12th examination. Each state has its own state board. This year 23 lakh students had appeared in the UP State Board. In this way, every year, crores of children pass the 12th examination and lakhs take marks above 90%. But how many of these children are able to succeed in real life. Or who gets full credit for their studies. There are millions of children who do not get the opportunity to show their ability. They have to be forced to make a lump and to arrange for the bread of June 2 for their family. Many children are not allowed to proceed with reservations. Wherever they go, they get reservation in front of them. In our country, children are not able to get opportunities to study, except technical education, colleges are also not available for studying arts. The situation is even worse, especially for girls living in far flung and villages.

It is good to have good marks, but do not forget even those children who have fewer marks. Good marks are never a guarantee that they will succeed. As far as possible teach children what they can become a passion. One of the advantages of this is that the child will do that work in minimum facilities as well. Because that is his passion. Therefore, along with good training, teach your children good rites, art of living and good skills in which they are interested and then every child of yours will succeed. And India will also be self-sufficient.

Friday, July 10, 2020

क्या भारतीय शिक्षा पद्धति बेरोज़गारी बढ़ा रही है ?

क्या भारतीय शिक्षा पद्धति बेरोज़गारी बढ़ा रही है ?
भारत में बेरोज़गारी हर सरकार के लिए एक मुख्य समस्या रही है। ऐसा नहीं है कि सरकार इस समस्या का हल नहीं करना चाहती होगी। किसी भी सरकार की कामयाबी में रोजगार देना एक अहम् मुद्दा होता है। फिर चाहे वो रोजगार सरकारी क्षेत्र में हो या निजी क्षेत्र में हो। सभी पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में बेरोजगारी की समस्या को हल करने का वादा किया जाता है। लेकिन कोई भी पार्टी सत्ता में आने के बाद इस वादे पर खरी नहीं उतरती। बेरोजगारी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। 
देखिये मै भी कोई स्पैशल एनालिस्ट तो नहीं हूँ बस अपने विचार आप के साथ शेयर कर रहा हूँ। आप मेरे विचार से सहमत भी हो सकते है नहीं भी। क्योंकि किसी समस्या को देखने का सबका अपना अपना नजरिया होता है। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। यहां के 60% लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़े हुए है और यही उनका प्राथमिक व्यवसाय भी है। अंग्रेजों के भारत में आने से पहले यहां की शिक्षा पद्धति ऐसी थी की हमे शिक्षा के साथ उन कार्यों को भी सिखाया जाता था जो हमारी रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े हुए थे। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थी को आत्मनिर्भर होना सिखाया जाता था ताकि वो अपने और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। उसके सामने रोजी रोटी का संकट ना आए ऐसी शिक्षा विद्यार्थियों को दी जाती थी। 
लेकिन अंग्रेजी शासन में शिक्षा की व्यवस्था केवल कर्मचारी पैदा करने वाली हो गई। अंग्रेजो ने हमे शिक्षित तो किया लेकिन केवल संवाद करने के लिए और नौकरी करने के लिए। उनकी व्यापार की नीति और केवल लाभ कमाने की नीति थी । जिससे हमारा वो कौशल नष्ट हो गया जो हमें आत्मनिर्भर बनाता था। हम खुद उन पर निर्भर हो गए। खेती में भी हम केवल वही फसलें पैदा कर सकते थे जिनकी अंग्रेजों को जरूरत होती थी। इस प्रकार से अंग्रेजो ने हमें पूरी तरह से अपनी पहचान और अपनी संस्कृति से दूर कर दिया। जिससे हम रोजगार देने के स्थान पर रोजगार लेने वालों की लाइन में लग गए। 
आजादी के 70 साल बाद भी हम उसी शिक्षा पद्धति पर चल रहे हैं। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा हम पर ऐसी थोपी आज भी हम उसे छोड़ नहीं पाए हैं। अंग्रेजी भाषा न जानने वालों को हम अनपढ़ की श्रेणी में गिनते हैं। कितने बच्चे इस अंग्रेजी भाषा की वजह से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं। कितने बच्चे को ये ही पता नहीं होता कि मैथ और साइंस के फार्मूले कहां पर काम आंएगे और उनको याद न कर पाने की वजह से उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। हर मां बाप अपने बच्चों को बचपन से ही यही सिखाते हैं ' बेटा 90-95% मार्क्स लेने है जितने ज्यादा मार्क्स उतनी बड़ी नौकरी '। हम बच्चों को नौकर बनने के लिए प्रेरित करते हैं, मालिक बनने के लिए नहीं। और हद तो तब हो जाती है जब बच्चे इतने मार्क्स ले भी लेते हैं लेकिन उनको नौकरी नहीं मिलती। दरअसल हमारे पढ़े लिखे 70% युवा उन नौकरियों के काबिल ही नहीं होते। दूसरा कारण भारत के बहुत से प्रतिभा संपन्न युवाओं को यहां पर मौका ही नहीं मिलता अपनी काबिलियत को निखारने और प्रयोग करने का। ऐसे युवा दूसरे देशों की ओर जाने पर मजबूर हो जाते हैं। अब तक 12 नोबेल पुरस्कार विजेता ऐसे रहे हैं जिनका संबंध भारत से रहा है लेकिन केवल रबीन्द्रनाथ टैगोर और सर सीवी रमन ही ऐसे थे जिनके पास भारतीय नागरिकता थी। बाकी दूसरे देशों की नागरिकता ले चुके थे। इतना ही नहीं कितने भारतीय दूसरे देशों में डॉक्टर, इंजिनियर, साइंटिस्ट और बड़ी बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर रहे हैं। 
यदि इन सबको अपने देश में काम करने के अवसर उपलब्ध होते तो इनको बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होती और इनके ज्ञान और अनुभव का पूरा लाभ भारत को मिलता। हमारी सरकारें आत्मनिर्भर बनाने की तो बात करते हैं लेकिन अवसर पैदा नहीं करते। साल 2019-20 में भारत का कुल बजट करीब 28 लाख करोड़ रु था, वही चीन 10 महीनों में 29 लाख करोड़ रुपए केवल शिक्षा पर खर्च कर चुका था। जबकि भारत का शिक्षा बजट 94 हजार करोड़ रुपए था। भारत में न तो कभी संसाधनों की कमी थी और न ज्ञान की कमी थी तो केवल सरकार की भूमिका की और वही आज भी है। आज हर किसी को धर्म, जात, राजनीति और नेता की चिंता है लेकिन अपने बच्चों के भविष्य की  चिंता नहीं है। हमारा मीडिया दिन रात बेमतलब के लिए मुद्दों के लिए कई कई दिन, कई कई महीने बहस कर सकता है लेकिन ऐसे मुद्दे मीडिया के लिए दोयम दर्जे के है। हमारी शिक्षा पद्धति में व्यापक बदलाव की जरूरत है तभी हम विश्वगुरु के सपने को साकार कर पाएंगे।

Sunday, July 5, 2020

5 जुलाई गुरु पूर्णिमा

5 जुलाई गुरु पूर्णिमा : 
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।
भारतीय संस्कृति में गुरु को विशेष महत्व दिया गया है। गुरु का स्थान भगवान से ऊपर माना गया है। कबीर जी ने अपनी वाणी में कहा है, गुरु और भगवान दोनों उसके सामने है किसके चरण पहले लागू, इस पर कबीर जी कहा है कि वह गुरु ही है जिन्होंने मुझे भगवान के दर्शन करवाए है। अतः पहले गुरु के चरण लगना चाहिए। 
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गुरु की विधि विधान से पूजा की जाती है। गुरु पूर्णिमा, वर्षा ऋतू के आरम्भ में आती है। 
संस्कृत में गुरु शब्द का अर्थ अज्ञान या अंधकार को मिटाने वाला होता है। गुरु साधक के अज्ञान को मिटाता है ताकि वह अपने भीतर ही सृष्टि के स्रोत का अनुभव कर सके। इस दिन साधक गुरु को अपना आभार प्रकट करते है और उनका  आशीर्वाद प्राप्त करते है। योग साधना और ध्यान का अभ्यास करने के लिए गुरु पूर्णिमा को विशेष लाभ देने वाला माना जाता है। 
भारत में अंग्रेजों के आने से पहले गुरु पूर्णिमा को अवकाश किया जाता था और लोग धार्मिक स्थलों पर जाकर अपनी खुशहाली के लिए प्रार्थना करते और अपने गुरु का आभार प्रकट करते थे। मानवता के इतिहास में इसी दिन को मनुष्यों को याद दिलाया गया कि उनका जीवन पहले से तय नहीं है यदि वे प्रयास करने के लिए तैयार है तो अस्तित्व का प्रत्येक दरवाजा उनके लिए खुला हुआ है। 
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
हमारे देश में कुछ समय पहले तक ऐसा ही माना जाता था कि हमारे जीवन में गुरु की विशेष महिमा है। गुरु सर्वोपरि है। 'गु' का अर्थ अंधकार और 'रु' का अर्थ हटाने वाला अर्थात अंधकार को हटाने वाला। हमारे देश में यह पर्व सबसे महत्वपूर्ण होता था। लोग इस पर्व को किसी जाती या पंथ के भेदभाव के बिना मनाते थे। उस समय ज्ञान प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता था। समाज में शिक्षक या गुरु को सर्वोच्च सत्ता का दर्जा दिया जाता था। महान सम्राट चंदरगुप्त ने अपने गुरु विष्णुगुप्त का अनुसरण करके दिखा दिखा दिया था कि गुरु अपने शिष्य को क्या बना सकता है। 
गुरु पूर्णिमा : वह दिन जब प्रथम गुरु का जन्म हुआ
सृष्टि के अस्तित्व या स्रोत का जो ज्ञान लोगों को है या फिर लोग जिस तरह से इसे समझते है, उसे आदियोगी एक नए रूप में ले गए। भगवान शिवशंकर को सबसे पहला गुरु माना गया है और जिस दिन वो सबसे पहले गुरु का जन्म हुआ उस दिन को गुरु पूर्णिमा कहा गया। गुरु पूर्णिमा वो दिन है जिस दिन पहले योगी योगी ने खुद को आदि गुरु अर्थात पहले गुरु के रूप में बदल लिया था। योगिक संस्कृति में शिव को भगवान नहीं माना जाता बल्कि आदि योगी अर्थात पहले गुरु के रूप में देखा जाता है। सृष्टि के स्रोत या अस्तित्व को आदि योगी एक नए आयाम में ले गए और उन्होंने अपने आप को सृष्टि और सृष्टि के स्रोत के बीच एक सेतू के रूप में बना लिया। उन्होंने मानव को बताया की यदि मानव इस मार्ग पर चलेगा, तो जिसे वह सृष्टि कर्ता कहता है, तो उसके और सृष्टि कर्ता के बीच कोई भेद नहीं रहेगा। तो इस प्रकार से यह दर्शनशास्त्र नहीं बल्कि एक विज्ञानं है। इस वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से मानव प्रकृति की उन सीमाओं से भी परे जा सकता है जिनमें वह सीमित है। 
लेकिन आधुनिकता के इस युग में हमने इस महान परम्परा को और इसके महत्व को खो दिया है। आज न तो एक शिक्षक का मान सम्मान रहा और न ही गुरु शिष्य की परम्परा। गुरु पूर्णिमा केवल कुछ आश्रमों तक सिमट कर रह गई है। सरकार के लिए ये विषय अव्यवहारिक होते जा रहे है। लोगों के लिए वैभव, धन दौलत के ज्यादा मायने हो गए है। शिक्षा का स्वरुप बदल गया है। लोगों के पास आध्यात्मिक शक्ति जगाने का समय नहीं है। इस ज्ञान को देने वाले भी निरंतर कम होते जा रहे है। शिक्षा में इस ज्ञान को कोई स्थान नहीं मिल पा रहा है। आज मानव केवल एक मशीन की भांति बनता जा रहा है। 
5 July Guru Poornima:
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।
Guru is given special importance in Indian culture. The Guru's position is considered to be above that of God. Kabir Ji has said in his speech, both Guru and God are in front of him, whose steps are implemented first, on this Kabir Ji has said that it is the Guru who has made me see God. Therefore, the first phase of Guru should be started.
The full moon of Ashadha month is celebrated as Guru Purnima. On this day, the Guru is worshiped by law.
The word Guru in Sanskrit means ignorance or eradication of darkness. The Guru eradicates the ignorance of the seeker so that he can experience the source of creation within himself. On this day, seekers show their gratitude to the Guru and receive his blessings. Guru Purnima is considered to be of special benefit for practicing yoga practice and meditation.
Before the British arrived in India, Guru Purnima was a holiday and people used to go to religious places to pray for their prosperity and thank their guru. On this day in the history of humanity, humans were reminded that their life is not predetermined, if they are ready to try, then every door of existence is open to them.
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
Until some time ago in our country it was believed that Guru has special glory in our life. Guru is paramount. 'Gu' means darkness and 'Ru' means one who removes darkness. This festival used to be most important in our country. People celebrated this festival without any caste or creed discrimination. At that time acquiring knowledge was considered most important. In society, the teacher or guru was given the status of supreme power. The great emperor Chandergupta followed his guru Vishnugupta and showed what a guru could make his disciple.
Guru Poornima: the day when the first Guru was born
Adiyogi took the knowledge of the existence or source of creation in a new form, or the way people understand it. Lord Shivshankar is considered to be the first Guru and the day he was born the first Guru was called Guru Purnima. Guru Purnima is the day on which Yogi first transformed himself into Adi Guru i.e. the first Guru. In Yogic culture, Shiva is not considered a god but is seen as an Adi Yogi i.e. the first Guru. The Adi Yogis took the source or existence of creation into a new dimension and they formed themselves as a bridge between the creation and the source of creation. He told the man that if man walks this path, then what he calls the creator, then there will be no distinction between him and the creator. So in this way it is not a philosophy but a science. Through this scientific method, human nature can go beyond the limits of which it is limited.
But in this era of modernity we have lost this great tradition and its importance. Today neither the honor of a teacher nor the tradition of Guru Shishya. Guru Purnima has been confined to only a few ashrams. These subjects are becoming impractical for the government. Splendor and wealth have become more important for the people. The nature of education has changed. People do not have time to awaken spiritual power. Those who give this knowledge are also becoming less and less. This knowledge is not getting any place in education. Today, humans are becoming just like a machine.




Friday, July 3, 2020

चीन का चारो ओर फैलता जाल

चीन का चारो ओर फैलता जाल
 :
हमेशा से ही चीन की नजर अपने पड़ोसियों की जमीन पर रही है।  चीन की सीमा भले ही 14 देशों के साथ लगती हो, लेकिन वह 23 देशों की जमीन या समुद्री सीमाओं पर नजर रखता है। चीन अब तक दूसरे देशों की 41 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि पर अपना कब्ज़ा कर चुका है। यानि चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति से अपने साइज़ को लगभग दुगना कर लिया है। पिछले 7 दशकों में चीन ने अपने मौजूदा हिस्से का 40% से ज्यादा हिस्सा दूसरे देशों से छिना है। चीन में 1949 में कम्युनिष्ट शासन की स्थापना हुई और तभी से चीन ने जमीन हड़पने की नीति शुरू कर दी। 
ईस्ट तुर्किस्तान
1949 तक चीन ईस्ट तुर्किस्तान की 16 लाख वर्ग कि. मी भूमि पर कब्ज़ा कर चुका था। यह इलाका उईगर मुस्लिमो का है तब से चीन इन लोगों पर जुल्म करता आ रहा है। 
मंगोलिया 
चीन  ने 1945 में मंगोलिया पर हमला कर दिया और 12 लाख वर्ग कि मी  का मंगोलिया के भू भाग पर कब्ज़ा कर लिया। यहां पर दुनिया के 25% कोयला भंडार है। 
तिब्बत 
1950 में चीन ने तिब्बत के 12 लाख वर्ग कि मी पर कब्ज़ा कर लिया।  यहां पर बहुत भारी मात्रा में खनिज सम्पदा है। यहां पर 80% बौद्ध आबादी है। यहां के धर्म गुरु दलाई लामा ने भारत की सरन ली हुई है। 
ताईवान 
1949 में चीन के राष्ट्रवादियों ने कम्युनिष्टों से डर कर ताईवान की शरण ली, चीन ताईवान को भी अपना हिस्सा मानता है। लेकिन ताईवान को अमेरिका का समर्थन हासिल है वह चीन का डटकर सामना कर रहा है। 35 हजार कि मी वाले समुंदर से घिरे ताईवान पर लम्बे समय से चीन की नजर है। 
भारत
 
ऐसे ही चीन ने 1962 में युद्ध करके भारत के 38 हजार वर्ग कि मी पर कब्ज़ा कर लिया। 5180 वर्ग कि. मी. का POK का इलाका पाकिस्तान ने चीन को दे दिया। इसके बाद भी चीन लगातार भारत के लद्दाक, अरुणाचल प्रदेश को भी अपना बताता रहा है। हालाँकि भारत ने चीन के साथ लगातार मैत्री करने की कोशिश की है लेकिन चीन की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। 
दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर
चीन ने इस क्षेत्र के 7 देशों सटे 35 लाख वर्ग कि. मी. समुद्र के 90% क्षेत्र पर अपना दावा ठोक रखा है। यहाँ से ३ लाख करोड़ का सालाना व्यापार, 77 अरब डॉलर का तेल और 266 लाख करोड़ क्यूबिक फ़ीट गैस भंडार है जिन पर चीन का कब्ज़ा है। ऐसे ही चीन पूर्वी चीन सागर के 81 हजार वर्ग कि. मी. पर भी नजर रखे हुए है। 
नेपाल 
चीन ने नेपाल के कई इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया हे और नेपाल की जनता अपनी सरकार से नाराज है। इस वजह से चीन ने नेपाल के लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भारत से सीमा विवाद छेड़ा हुआ है। चीन ने उधर नेपाल में बड़े पैमाने पर निवेश किया हुआ है जिस बहाने वह चीन को कब्जाने में लगा हुआ है और भारत के लिए भी अवरोध उत्त्पन कर रहा है। 
हांगकांग 
हांगकांग में चीन लगातार मानवाधिकारों का उलंघन करता आ रहा है। तीन दिन पहले चीन ने हांगकांग के लिए राष्ट्रिय सुरक्षा कानून पारित कर दिया है जिससे वहां के लोगों की आवाज को दबाया जा सके। 
चीन की विस्तारवाद नीति के कारण इस वक्त एशिया महाद्वीप में जंग के हालात  बने हुए है। एक  तो कोरोना के कारण चीन इस वक्त सभी मुल्कों की नजर में आया है, पूरी दुनियां इस संकट का कारण चीन को मान रही है जिससे अभी तक पूरी दुनियां में 5 लाख से ज्यादा लोग मर चुके है और अभी तक इस महामारी का कोई उपाय नहीं ढूंढ पाए है। पूरी दुनिया में चीन के प्रति गहरा रोष है। 


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