भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़े
बुझी हुई बाती सुलगाए।
आओ फिर से दिया जलाएं।
प्रधानमंत्री की अपील पर आज रात 9 बजे 9 मिनट तक अपने घर की लाइट बंद करके एक दिया जलाना है। ये अपील ऐसे समय में आई है जब देश पर और पूरी दुनियां पर संकट आया हुआ है। ऐसे समय में सभी देश वासियों को एकता का परिचय देना है और इस महामारी से लड़ने का संकळप लेना है। ये संकट वैश्विक है और ऐसे संकटों से केवल सरकार या कुछ लोग के द्वारा नहीं लड़ा जा सकता इसमें सभी का सहयोग जरूरी है। ऊपर लिखी हुई कविता पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की है। अटल जी उच्च कोटि के वक्ता और कवि थे। उनकी कविताओं का प्रधान स्वर राष्ट्र प्रेम है। उन्होंने हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। उन्हीं की कविताओं की कुछ पंक्तियाँ लिख रहा हूँ
होकर स्वतंत्र मैने कब चाहा है कर लू जग को गुलाम। मैंने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।
अटल जी ने भी इंसान को इस अँधेरे से जो मानव के जीवन में इस समय आया हुआ है इससे निकलने के लिए एकता का दिया जलाने की बात कही है। बहुत से लोग प्रश्न कर रहे है की क्या दिया जलाने से कोरोना वायरस भाग जायेगा तो मै कहना चाहूंगा नहीं भागेगा लेकिन दिया एक प्रतीक मात्र है सभी लोगों को एकजुट करने के लिए, संकल्प लेने के लिए, लोगों को जागृत करने के लिए, जन जन की भागेदारी के लिए हम सब को मिलकर आज उस बुझी हुई देशप्रेम और एकता की बाती को जगाना है और कोरोना को हराना है।

No comments:
Post a Comment